मैने तुम्हें प्रेम किया
पर अंधा होकर नहीं।
मेरी चेतना जाग रही थी,
मेरी बुद्धि देख रही थी,
मेरी इंद्रियाँ निर्णय ले रही थीं।
पहले मैंने तुम्हारा रूप देखा,
त्वचा का रंग,
देह की रेखाएँ,
आँखों की गहराई,
ज़ुल्फ़ों की लय।
फिर तुम्हारी आवाज़ सुनी,
तुम्हारे साथ बैठा,
तुम्हारी उपस्थिति को अपने भीतर तौला।
जो अनुकूल लगा,
उसे मैंने स्वीकार किया।
और उस स्वीकृति को
प्रेम नाम दे दिया।
तुम्हारा इंकार आया,
पर वह मेरे प्रेम को रोक न सका।
क्योंकि मेरा प्रेम
भावना से अधिक
निर्णय था।
धीरे-धीरे
तुम्हें सोचने की आदत पड़ी,
तुम्हारे होने की आदत,
तुम्हारे बिना भी तुम्हें चाहने की आदत।
अब यह प्रेम कम,
एक स्थापित आदत अधिक है।
तुम चली जाओ,
लौट आओ,
या मेरी ज़िंदगी में कोई और आए ,
यह आदत कुछ समय तक जीवित रहेगी।
क्योंकि मनुष्य का प्रेम
दिव्य नहीं होता,
वह सचेतन होता है।
वह रूप देखता है,
अनुकूलता खोजता है,
स्वर, स्पर्श, व्यवहार ,
सबको परखता है।
मैं सहानुभूति दे सकता हूँ
उनके लिए जो मुझे आकर्षित नहीं करते,
मदद कर सकता हूँ,
दयालु रह सकता हूँ ,
पर प्रेम नहीं कर सकता।
प्रेम वहाँ जन्म लेता है
जहाँ मेरी चेतना सहमत होती है।
और समय के साथ
वही चेतन चयन
आदत बन जाता है।
हम उसे पवित्र कहते हैं,
शाश्वत कहते हैं,
भाग्य कहते हैं ,
पर सच यह है
कि मनुष्य का प्रेम
निर्णय से जन्मता है
और आदत से टिकता है।
बिना चेतना,
बिना बुद्धि के
प्रेम करना
मनुष्य के बस में नहीं।
अगर अब सवाल ये है की प्रेम कैसे करे और ये प्रेम है क्या ? - Continue....
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणी: केवल इस ब्लॉग का सदस्य टिप्पणी भेज सकता है.